SAVE WEST BENGAL FROM TRINAMOOL CONGRESS

RESIST FASCIST TERROR IN WB BY TMC-MAOIST-POLICE-MEDIA NEXUS

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Sunday, March 8, 2020

'मेरा जिस्म, मेरी मर्ज़ी' यानी महिला के शरीर पर सिर्फ़ उसका अधिकार है। ये नारा उस पितृसत्तात्मक सोच पर चोट है जिसके तहत औरत के शरीर पर पुरुष का हक़ माना जाता है। इन दिनों ये नारा पाकिस्तान में खासा चर्चा में है। वजह 8 मार्च, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर होने वाला 'औरत मार्च' है। इस मार्च को लेकर पाकिस्तानी कट्टरपंथी विरोध कर रहे हैं, कोर्ट के आदेश के बावजूद ताकत के ज़ोर पर मार्च को रोकने की धमकियां दे रहे हैं। दुनिया भर में महिलाएं अत्याचार, बलात्कार, वैवाहिक ज़बरदस्ती, यौन हमले जैसे अनेकों ज़ुल्म का शिकार हैं। नारी शरीर पर केंद्रित हिंसा की समस्या का कोई ओर-छोर नहीं है। विश्व के बड़े देशों से लेकर छोटे मुल्कों तक हर जगह महिलाएं अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं। 'औरत मार्च' के आयोजकों के मुताबिक भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में 93 प्रतिशत महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न होता है। इनमें से करीब 70 फीसदी यौन उत्‍पीड़न तो खुद उनके परिवार के सदस्य ही करते हैं। इस अत्याचार के ख‍िलाफ महिलाएं 8 मार्च को सड़क पर उतर कर मार्च कर रही हैं, जो फिलहाल इस पुरुषप्रधान देश में कुछ कट्टरपंथियों की परेशानी का सबब बना हुआ है। महिलाओं के इस मार्च के खिलाफ सर्वाधिक मुखर दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी संगठन हैं। जमीयत-ए-उलेमाए इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर रहमान ने अपने समर्थकों का आह्वान किया है कि वे हर हाल में इस मार्च को होने से रोकें। हाल में एक रैली में मौलाना फजल ने ‘औरत मार्च’ का नाम लिए बिना कहा था, 'जब कभी भी आप इस तरह के लोगों को देखें, सुरक्षा कर्मियों को इनके बारे में अलर्ट करें। और अगर सुरक्षाकर्मी इन्हें ही सुरक्षा दे रहे हों तो ताकत के जोर पर इन्हें रोकने के लिए आपकी कुर्बानी की ज़रूरत पड़ेगी।' इस साल 'औरत मार्च' पर रोक लगाने की मांग पाकिस्तान हाईकोर्ट में भी उठी। एक याचिकाकर्ता ने इसे ‘इस्लामी क़ायदों’ के खिलाफ बताते हुए कहा है कि इस मार्च का छुपा एजेंडा ‘अराजकता, अश्लीलता और नफ़रत फैलाना’ है। हांलाकि लाहौर हाईकोर्ट ने इसे नकार दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में देश के संविधान और कानून का हवाला देते हुए कहा कि इस मार्च को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने नागरिक प्रशासन को आदेश दिया कि वह मार्च निकालने के लिए दी गई अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला करे। अदालत ने मार्च निकालने पर रोक नहीं लगाने की बात कहते हुए यह भी कहा कि ‘मार्च में किसी तरह के घृणा भाषण या अनैतिक बातें’ नहीं होनी चाहिए। अदालत ने पुलिस से मार्च को पूरी सुरक्षा देने को भी कहा है। वैसे, 'औरत मार्च' के पोस्टर-बैनर को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर अपना हक़ जताते हुए मार्च में प्रदर्शित कई तख्तियां अभी भी लोगों के जेहन में हैं, जिनमें सेनेटरी पैड को टैक्स फ्री करने, महिलाओं पर एसिड नहीं फेंकने, स्त्रियों की लॉलीपॉप, आईपैड या जूस बॉक्स से तुलना नहीं करने और बेटियों को विरासत का अधिकार देने की मांग उठाई गई थी। कई बार मार्च का विरोध कर रहे लोगों को महिला आंदोलन द्वारा उठाई गई इन मांगों से कोई लेना देना नहीं होता। उन्हें सिर्फ समाज की पहले से चली आ रही दकियानूसी बातों से मतलब होता है। ये तख्ती-पोस्टर उनके सम्मान में गुस्ताखी जैसे प्रतीत होते हैं। दुनिया के सामने 'प्रगतिशील' होने के दावा करने वाली पाकिस्तान की इमरान सरकार फिलहाल इस मार्च को लेकर उलझन में नज़र आ रही है। अगर सरकार कट्टरपंथियों पर कार्रवाई करती है तो उस पर संकट आ सकता है। अगर कार्रवाई नहीं करती तो समाज के सभी वर्गों को समान हक देना के पाकिस्तान सरकार के वादे की पोल खुल जाएगी। उधर, विपक्षी राजनैतिक दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने 'औरत मार्च' को अपना पूर्ण समर्थन देने का ऐलान करते हुए सरकार से इसे सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है। पाकिस्तान की मानवाधिकार मामलों की मंत्री शीरीन मजारी ने मार्च का खुलकर समर्थन किया है। मजारी ने उन नेताओं की निंदा की है, जो इस मार्च को ताकत के जोर पर रोकने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज के और तबकों की तरह महिलाओं को भी अपने हक़ में आवाज उठाने का अधिकार है। गौरतलब है कि 8 मार्च का दिन पूरे विश्व में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कई देशों के कई शहरों में औरतें अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करती हैं। लेकिन अक्सर महिलाओं के साथ हिंसा और दमन की बातें पितृसत्ता की सोच रखने वालों को परेशान कर जाती हैं। सदियों से पुरुष महिलाओं पर अपना हक़ समझते आए हैं, ऐसे में खुलेआम महिलाओं का ये आंदोलन उनके लिए चिंता का सबब है।

'औरत मार्च' पाकिस्तान के पितृसत्तात्मक सोच पर एक चोट है! | न्यूज़क्लिक