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Sunday, March 8, 2020

भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में महिलाओं के प्रति सम्मान के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों का सम्मान किया जाता है। उन पर गर्व किया जाता है। उनका गरिमा के साथ जीना मानवीय अधिकारों का आनंद एक उत्सव की तरह सेलिब्रेट किया जाता है। पर हमारे देश में मैला ढोने वाली महिलाओं की क्या स्थिति है इससे भी रूबरू होना ज़रूरी है। ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) के इस दौर में जब पूरे विश्व में समान मानव अधिकारों की बात की जा रही है, हमारे देश में गरिमा के साथ जीने के अधिकार का सरेआम उल्लंघन किया जा रहा है। आज भी भारत में लगभग एक लाख से अधिक महिलाएं मानव-मल ढोने की घृणित और अमानवीय प्रथा में लगी हैं। तकनीक के इस युग में मैनुअल स्केवेनजिंग (मैला प्रथा) का जारी रहना शर्म की बात है। भारत विश्व का सबसे बड़ा विकासशील देश है। इसमें दो राय नहीं है कि भारत तेजी से विकास कर रहा है। पर इस इक्कीसवीं सदी में भी इस घृणित प्रथा का जारी रहना हम सबके लिए शर्मनाक है। प्रश्न उठता है कि इस आधुनिक समय में भी सदियों से चली आ रही यह अमानवीय प्रथा अस्तित्व में क्यों है? इस पर विचार करने से ज्ञात होता है कि इसकी जड़ें हमारी सामाजिक व्यवस्था में हैं।

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